जानवी & अनिमेष – 3

जानवी & अनिमेष – 2

आख़िरकार अनिमेष अनाथालय पहुँच गया, उसने अपनी बाइक पार्क करी, और गिफ्ट लेकर अंदर बच्चो के बीच पंहुचा। मारिया बच्चो से बहुत दिनों बाद मिली थी, वो उनके साथ मग्न हो गयी। अनिमेष अक्सर आया करता था अपनी जानवी से मिलने। वो सारे बच्चों में अपनी जानवी को ढूंढ रहा था। जब जानवी अपने हाथों को फैलाते हुए दूसरे कमरे से निकली अनिमेष के चेहरे पर मुस्कराहट बिखर गयी। वो तीन साल की छोटी सी बच्ची जिसका नाम अनिमेष और मारिया ने ही जानवी रखा था।

उस पूरे दिन को अनिमेष ने बच्चो के साथ खेलने, समय बिताने, और सिखाने में बिताया। शाम के वक़्त जानवी ने बर्थडे केक काटा, अनिमेष और मारिया ने बच्चो को गिफ्ट बाँटे, और फिर बेमन से घर का रुख किया।

मारिया घर पहुँची तो उसका पति जोसफ इंतज़ार कर रहा था। वो पहुँची तो जोसफ ने पुछा, “कैसा रहा आज का दिन?” जवाब मिला, “अच्छा था, बच्चे बहुत खुश थे।”
“अनिमेष कैसा है?”
“अच्छा हैं, बच्चे उसे अच्छी कंपनी देते है।”
“और जानवी…”
“बहुत मस्ती करने लगी है, तुतलाते हुए बोलने लगी है। हमारे सामने ही तो बड़ी हुई है उसका हर कुछ नया सीखना सुकून देता है।”
“अनिमेष की लाड़ली।” जोसफ ने कहा।
“जोसफ, तुम जानते हो आज अनिमेष ने गाना भी गाया बच्चो के लिये।”
“उसे गाना आता है?”
“आज गाया उसने और अच्छा भी था, गिटार भी बजाने लगा है, पता नही कब सीखा उसने। पहले गुनगुनाता भी था तो कान दुःख जाते थे। सच्ची, जब वो बच्चो के साथ होता है तभी सुलझा होता है, बिल्कुल पहले जैसा। जानवी से अनिमेष भले दूर है, पर जानवी अनिमेष से कभी दूर नही हुई। उसके दिल मे आज भी जानवी की यादें ताजा है। हम वार्डन से बातें कर रहे थे। वार्डन ने अनिमेष से पूछा, “बहुत चाहते हो जानवी को।” और उसका जवाब था – हाँ, बहुत ज्यादा। इससे पहले कुछ और बातें होती जानवी अपने अनिमेष अंकल को बुलाने आ गयी। जानवी को और फ़ोटो खिचवांनी थी अनिमेष ने कभी मना तो किया न था। कुछ देर में ही अनिमेष और सारे बच्चे मेरी आँखों से ओझल हो गए। सब के सब एक कमरे में बैठे थे, अनिमेष जानवी को गिटार सीखाने की कोशिश कर रहा था। मैं बस उस कमरे के दरवाजे से उस वक़्त को अपनी आँखों मे कैद कर रही थी। जितनी मोहब्बत अनिमेष जानवी से कर रहा था, इतनी तो शायद जानवी भी नही कर पाती। न इक़रार हुआ, न इनकार हुआ, एक तरफा प्यार भी इतना की अनिमेष इतना बदल गया। जोसफ, अनिमेष कभी इतना सादगी से भरा, उलझन सुलझन के बीच झूलता, परवाह करने वाला कभी नही था, बस जानवी ने बदल दिया।
“और तुम्हारे आंसुओ की वजह भी।” मारिया जोसफ के गले लग गयी। जो बीत गया इतने सालों पहले, वो फिर ताज़ा हो गया।

अनिमेष अपने घर पहुँचा और सबसे पहले अपनी और जानवी की फ़ोटो के पास, कहने लगा, “जानवी बच्चे बहुत खुश थे, तुम्हे याद कर रहे थे। काश तुम होती, मुझे इतने सारे झूठ न कहने पड़ते। तुम होती तो मैं जैसा हूँ वैसा न होता, तुम होती तो मैं सबसे ज्यादा खुश होता। काश मैंने तुम्हें बुलाया न होता। न मैं बुलाता, न तुम आती और न तुम इतनी दूर चली जाती कि केवल इस तस्वीर का ही सहारा होता।”

अनिमेष जानवी का इंतेज़ार कर रहा था उसी जगह जहाँ उसे आने को कहा गया था। पांच से छः बज गए थे। मारिया के ही फ़ोन कॉल ने उसका इंतज़ार तोड़ा। मारिया उसे अपने घर बुला रही थी, पर अनिमेष ने मना कर दिया ये कहकर की वो जानवी आने वाली है, उसी का इंतज़ार कर रहा हूँ। कितना समझाया उसने वो नही माना, न जाने कितना रोका मारिया ने अपने आप को अनिमेष से ये कहने में – अरे जानवी, मेरे घर आयी है, तू जल्दी आ।”
“पर वो तो यहाँ आने वाली थी।”
“मुझे नही पता तू आजा” और मारिया ने फोन काट दिया।

अनिमेष के चेहरे पर उत्साह आ रहा था, मुस्कुराहट बिखर गई थी ये जानकर कोई उसका इंतेज़ार कर रहा है। इधर मारिया की आंखें थम नही रही थी।

जब अनिमेष पहुँचा तो उसकी नज़र जानवी को ढूंढ रही थी। सवाल लबो पर आता वीर भी वहाँ आ गया था पर मारिया खामोश थी। कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या हुआ है। वीर ने बताने की ठानी, रुकते थमते उसने अनिमेष को बताया कि जानवी का एक्सीडेंट हो गया, वो नही रही। दुनिया थम गई थी दो पल के लिए, समझना मुश्किल था और समझने के लिए सच्चाई स्वीकारना नामुमकिन। आंखों से निकले पहले आंसू साबित कर चुके थे कि सच्चाई स्वीकार ली गई थी। उसके लगातार बहते आँसू उसके एक तरफा रह चुके प्यार की सच्चाई जतला रहे थे। कौन कौन रुकता और कौन कौन रोकता अपने आप को। जानवी जिसने अपना बर्थडे कल इतनी खुशी से मनाया था, अगले दिन वो अचानक वहाँ जा चुकी, जहाँ से वो कभी नही आ सकती।

तीनो जानवी के घर पहुँचे, माहौल गमगीन था। जवान बेटी दुनिया छोड़ गई थी। वहाँ उसी जगह कल जानवी को बर्थडे विश किया था, वही शायद उसका शरीर रखा जाएगा। यही सोचकर आंखें नदिया बन रही थी, बहे जा रही थी। गुनाह का इल्म अनिमेष को गुनाहगार बना रहा था। उसी ने तो कल मोहब्बत का इजहार जानवी से किया था, और वो आज मिलने आने वाली थी।

जब गुनाह का इल्म मारिया के कानों तक पहुँचा, मारिया ने वीर से अनिमेष को ले जाने को कहा। कैसे खामोश रहता अनिमेष, उसने तो अपने आप को जानवी की मौत का कारण समझना शुरू कर दिया। उसके सामने से जाती एम्बुलेंस सारी हिम्मत तोड़ चुकी थी। कभी ऐसा तो नही सोचा था, जिस जिंदगी के साथ ज़िन्दगी निभाई जा सकती थी, वो ज़िन्दगी ही न निभ सकी।

कुछ ही घंटों पहले की बात है, जानवी अपनी स्कूटर से अनिमेष से मिलने निकल गयी। घर पर तो केवल एक घंटे में वापिस आने का वादा किया था। बहुत खुशी थी जानवी के चेहरे पर। उसको अनिमेष को जवाब देना था। करीब दस मिनट ही हुए थे, घर से कुछ दूर ही हुई थी, मेन रोड को जोड़ने वाली एक संकरी गली उसकी नज़रों में शॉर्टकट बन गयी। पता नही क्यों उसने उसकी तरफ आती दोनों गाड़ियों पर ध्यान क्यों नही दिया, और जब दिया वो अपने आप को संभाल ही न पायी। कहते है उसकी जिंदगी कुछ पल भी नही रुकी। इंतेज़ार ही था जो कभी पूरा नही हो सका। जिसकी झलक को अनिमेष हमेशा बेताब रहता था, उस जानवी को आखिरी बार भी नही देखा। वो हवाओ में खोने वाली थी, पर न देखने की भी मज़बूरियां थी।

गम कभी खत्म कहाँ होता है, दर्द कितना छिपाता, वो हर जगह नाम हो गया। जल रहा था वो पश्चाताप की आग में लेकिन मारिया का कहना भी सही था, जो बात जानवी को खुशी देती हो, अनिमेष को वही करना चाहिए। मारिया के शब्द अनिमेष में जानवी के लिए आज भी बेइंतहा है, वो कहता है मोहब्बत कहने में हर्ज़ है, वो एक बार तो पूरी होती है, दोनों तरफ इक़रार तो होता है।

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