जानवी & अनिमेष – 2

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जानवी & अनिमेष – 1


जब झूठा सपना जानकर अनिमेष उठकर बैठा, पलंग के पास टेबल पर रखी फोटोफ्रेम पर नजर पड़ी, चेहरे पर खुशी और निराशा की मिली जुली मुस्कुराहट आ गयी। फ़ोटो में जानवी और अनिमेष साथ थे, उसने कहा, “हैप्पी बर्थडे जानवी। तुम फिर चली गयी न। चलो मैं तुम्हारी खुशियों को वापिस जीने जा रहा हूँ, तुम्हारे प्यारे बच्चो से मिलने। तुम्हे आज फिर वो याद करेंगे, कह दूँगा तुम नही आ सकी।”
अनिमेष ने अपने आप को तैयार किया, और बाकी तैयारी वो कल ही कर चुका था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मारिया आयी हुई थी आज के दिन में वो भी सहभागी थी।
आते ही मारिया बोली, “सब तैयार है अनिमेष?”
“हाँ, बस ये सारा सामान पहुँचाना है, ऑटो बुलवा लिया है।”
सामान ऑटो में चढ़ाकर मारिया और अनिमेष अपनी अपनी गाड़ी से उनकी मंज़िल तक निकल गए।
रास्ते मे फिर अनिमेष अपनी कहानी खुद को बयां करने लगा।
“जानवी का आज पच्चीसवां जन्मदिन है, मुझे याद है, क्या हुआ जो हम साथ नहीं है, उसके होने का एहसास कभी नहीं खोयेगा। आज मेरी मंज़िल वही अनाथालय हैं, जहाँ जानवी ने मेरे साथ पहली बार बर्थडे सेलिब्रेट किया था। जब मैंने रजामंदी दे दी थी कि उसके नेक काम में मैं उसका साथ दूंगा, तो मैंने अपने कुछ दोस्तों से भी ये बात शेयर करी और वो लोग भी जानवी के लगाव से जुड़ने को तैयार हो गए। मैं यही कुछ पांच हज़ार रुपये जमा करके उसके गिफ्ट्स ले आया था। बर्थडे के दिन मैं मारिया के साथ जानवी के घर पंहुचा। हमे देखकर वो बहुत खुश हुई। उसने काफी सारा सामान बाहर दरवाज़े के सामने रखा था, जो वो अनाथालय में देने वाली थी। हमने सबसे पहले उसे बर्थडे विश किया। फिर वो कहने लगी, “शुक्रियां दोस्तों, पहले मैं ये सब अकेले करती थी इस बार तुम लोग भी मेरे साथ जुड़ गए।”

फिर हम निकल गए। जब मैंने जानवी के साथ उस अनाथालय में पहला कदम रखा, बहुत अजीब सा एहसास हुआ। मैं मद्धम सा हुआ और मैंने देखा हम तीनो में से जानवी सबसे पहले बच्चो से मिली। मैं उसे देखा जा रहा था। वो बच्चो के साथ खेल रही थी, उनकी शिकायते सुन रही थी, शायद उन बच्चो में बच्चा बन जाना ही उसकी इच्छा थी। वो अपना समय उसी की दुनिया में बीता रही थी। मारिया, मैं, और हमारे दोस्त भी बच्चो का साथ बच्चे बनने में लग गए। उनको कुछ नया सीखाना, उनकी नासमझ बातें सुनना और कुछ पल के लिए सही अपना बचपन वापिस जीना, सबको नया लग रहा था। इन सबके बाद भी मैंने सबसे ज्यादा ख़ुशी मैंने उन मासूमो के चेहरे पर देखी जिनके पास कुछ न था, पर लुटाने को खुशियां हज़ार थी।

मारिया ने केक का आर्डर पहले ही दे रखा था। शाम को जानवी ने सभी दोस्तों के सामने, बच्चो के साथ केक काटा। मस्ती मज़ाक, खेलकूद में रात हो रही थी। आख़िरकार यही वो वक़्त था जब जानवी अपनी दुनिया में वापिस लौटी। वो मुझे वजह बता रही थी उसके इस यादगार बर्थडे का, उसका कहना था कि मैं न होता तो वो इस तरह अपना बर्थडे सेलिब्रेट नहीं कर पाती। सभी दोस्तों ने बच्चो और हमसे अलविदा कहा और चले गए, हमारे निकलते तक करीब नौ बज गए थे। जानवी के घर के बाहर पहुंचे, मारिया भी साथ थी।

मैंने उस दिन कुछ नहीं सोचा था पर अब छिपा भी नहीं पा रहा था। आखिरकार मैंने कह दिया जो मैं उससे पिछले छः महीनो से कहना चाहता था। मैंने उससे सब कुछ कह दिया जो भी मेरे मन में चल रहा था, जितना भी कह सकता था उसे पहली नज़र में देखने से लेकर उस दिन तक। जानवी और मारिया दोनों ही चौंक गए थे। मारिया जानती तो थी कि मेरे मन में क्या है पर उसको भी शायद यकीन नहीं हो रहा था कि मैं अचानक जानवी को प्रोपोज़ कर दूंगा। जानवी के सवालो के जवाबो में मारिया केवल हामी भर रही थी। पता नहीं जानवी को मेरी बातों का कितना असर हुआ, वो चुपचाप अपने घर के अंदर जाने लगी, मैं केवल इतना कह पाया, “प्लीज जानवी, एक बार जरूर सोचना।”

मारिया सरे राह मुझ पर चिल्ला रही थी कि मैने उसे पहले क्यों नहीं बताया, पर मैं चुप रहा। उसके घर का सामने बाइक रोकी, और उसे उतरने को कहा, बाद में बिना कुछ कहे घर आ गया।

उस रात शायद हम तीनो ही सोच में डूबे रहे होंगे, नींद कही भी नहीं रही होगी। मारिया मुझे लगातार कॉल कर रही थी, पर मुझे जानवी का इंतज़ार था। रात करीब दो बजे जानवी का मैसेज आया, ‘थैंक्स’। नींद तो नहीं थी पर आँख कब लगी थी और अल-सुबह खुल गयी पता ही नहीं पड़ा। सुबह एक और मैसेज आया कि यदि मैं उससे शाम को मिलना चाहु तो वो शाम को मिलना चाहती है। मैंने हाँ जवाब भेजा और उसने मिलने की जगह और समय बताया। दोपहर में उसने अपने बर्थडे की फोटोज अपलोड कर दी, और एक मैसेज भेजा कि मैं अपने दोस्तों को टैग कर लू, क्यूंकि वो सबको नहीं जानती। मैंने कर दिया।

शाम को पांच बजे मिलने से पहले मैं थोड़ा नर्वस था। दोपहर भर अपने आप को उसके संभावित सवालो और मेरे जवाबो को तैयार कर रहा था। फिर ये भी था की वो कि वो हाँ बोलेगी या ना बोलेगी, मुझे डर उसके गुस्से का था, जो मैंने कभी देखा नहीं था। बहुत कुछ था जो दिमाग में चल रहा था बिना रुके। नर्वस्नेस इतनी थी कि पांच की बजाय साढ़े चार बजे से ही जानवी का इंतज़ार उस जगह कर रहा था, जो उसके घर से महज पंद्रह मिनट दूर थी। मैं उसका इंतज़ार कर रहा था…”

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