बचपन

सुबह की घनघोर बारिश ने आज जल्द ही मुझे  जगा दिया, और फिर खिड़की से बाहर देखा, एक छोटा सा बच्चा अपने आप को उस बारिश की घनघोरता में अपने आप को घुलाता जा रहा था, बचपन शायद यही था, जो इस छब्बीस की उम्र में पीछे भागदौड़ में कही खो गया। लौट भी नहीं सकता उस पड़ाव पर जहाँ मैं नासमझ था, दुनिया समझदार थी। आज हर कोई कहता है समझदार हो गए हो। मेरा बचपन खो गया, अब समझदार तो होना बनता ही है। डूबा रहा अपने बचपन के गलियारों में इधर उधर झाँकता, तभी हर रोज़ की तरह नींद तोड़ दिए जाने का हुक्म हुआ, पर शायद मैं मगन कुछ यूं था, कि माँ को आकर मेरी छब्बीस सालों में रोज़ की तरह तारीफों के पूल बांधने पड़े, मेरे बोलो पर वही जवाब था जो रोज़ छब्बीस सालों से दिया करता, क्या करना हैं इतनी सुबह उठ के?

माँ तो चली गयी पर फिर मैं अपने खयालो में और एक बात समझ आयी – 

बचपन तो चला गया, पर बचपन देने वाली माँ साथ है।

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