पहली झलक

बातों में लगा उसे पहली बार देखकर, उस दफा किसी अपने का चेहरा नज़र आने लगा।
इमारतों के गलियारों में वो अक्सर नज़र आती, और मैं उसे देख कर खुश हो जाया करता।
गुनहगार बनने लगा था मेरे दिल की बेसब्री का, इंतज़ार मैं उसका हर मर्तबा करने लगा था ।
वो दिखती मेरा गुनाह कम हो जाता, बरी हो जाती मेरी साँसे उसकी झलक मेरी आँखों में देखकर।

मर्तबा गुज़रिशों ने मुल्ज़िम बना दिया इश्क़ का,
इश्क़ का सजदा भी न होता तो इश्क़ का दस्तूर क्या?
मेरा सजदा उसकी आँखों में नूर हुआ था,
उसने जो कहा, ये सजदा क्या था?
मानो मेरी ख्वाइश पूरी कर दी उसने,
जब लफ्ज बयान किये उसने,
“क्या कहती है ये झलके तुम्हारी? इसमें क्या एहसास है जो हर दफा गुज़ारिश करती है?”

मैंने कहा कैसे कहूँ तेरी पहली झलक में इश्क़ का चेहरा नज़र आने लगा था,
तू दूर था पर मैं तेरे करीब हुआ जा रहा था।
मेरी नजरे उसके करीब थी, लफ्ज़ खामोश थे और मैं उसे देखकर दिल का नादान गुनहगार बन बैठा।

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